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Sri Dasam Granth Sahib

       


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ਨ੍ਰਿਪ ਪੁਤ੍ਰ ਸੋਗ ॥ ਗਯੋ ਸੁਰਗ ਲੋਗ ॥ ਨ੍ਰਿਪ ਭੇ ਸੁ ਜੌਨ ॥ ਕਥਿ ਸਕੇ ਕੌਨ ॥੮੯॥

Naripa Putara Soga ॥ Gayo Suraga Loga ॥ Naripa Bhe Su Jouna ॥ Kathi Sake Kouna ॥89॥

न्रिप पुत्र सोग ॥ गयो सुरग लोग ॥ न्रिप भे सु जौन ॥ कथि सके कौन ॥८९॥

In his extreme sorrow on the demise of his sons, the king left for heaven and after him, there were several other kings; who can describe them?89.

169141 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੧


ਇਤਿ ਸ੍ਰੀ ਬਚਿਤ੍ਰ ਨਾਟਕ ਗ੍ਰੰਥੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਵਤਾਰ ਬਿਆਸ ਰਾਜਾ ਪ੍ਰਿਥ ਕੋ ਰਾਜ ਸਮਾਪਤੰ ॥

Eiti Sree Bachitara Naattaka Garaanthe Barahamaa Avataar Biaas Raajaa Paritha Ko Raaja Samaapataan ॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे ब्रहमा अवतार बिआस राजा प्रिथ को राज समापतं ॥

End of the description of Vyas, the incrnation of Brahma and the rule of king Prithu in Bachittar Natak.

169152 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੨


ਭਾਗ

Bhaag

भाग

SECTION

169163 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੩


ਅਥ ਜੁਜਾਤ ਰਾਜਾ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥

Ath Jujaata Raajaa Ko Raaja Kathnaan ॥

अथ जुजात राजा को राज कथनं ॥

Now begins the description about king Yayati

169174 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੪


ਮਧੁਭਾਰ ਛੰਦ ॥

Madhubhaar Chhand ॥

मधुभार छंद ॥

MADHUBHAAR STANZA

169185 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੫


ਪੁਨ ਭਯੋ ਜੁਜਾਤ ॥ ਸੋਭਾ ਅਭਾਤ ॥ ਦਸ ਚਾਰ ਵੰਤ ॥ ਸੋਭਾ ਸੁਭੰਤ ॥੯੦॥

Puna Bhayo Jujaata ॥ Sobhaa Abhaata ॥ Dasa Chaar Vaanta ॥ Sobhaa Subhaanta ॥90॥

पुन भयो जुजात ॥ सोभा अभात ॥ दस चार वंत ॥ सोभा सुभंत ॥९०॥

Then there was a most glorious king Yayati, whose fame had spread in the fourteen worlds.90.

169196 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੬


ਸੁੰਦਰ ਸੁ ਨੈਣ ॥ ਜਨ ਰੂਪ ਮੈਣ ॥ ਸੋਭਾ ਅਪਾਰ ॥ ਸੋਭਤ ਸੁਧਾਰ ॥੯੧॥

Suandara Su Naina ॥ Jana Roop Maina ॥ Sobhaa Apaar ॥ Sobhata Sudhaar ॥91॥

सुंदर सु नैण ॥ जन रूप मैण ॥ सोभा अपार ॥ सोभत सुधार ॥९१॥

His eyes were charming and his form of enormous glory was like the god of love.91.

169207 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੭


ਸੁੰਦਰ ਸਰੂਪ ॥ ਸੋਭੰਤ ਭੂਪ ॥ ਦਸ ਚਾਰ ਵੰਤ ॥ ਸੋਭਾ ਅਭੰਤ ॥੯੨॥

Suandara Saroop ॥ Sobhaanta Bhoop ॥ Dasa Chaar Vaanta ॥ Sobhaa Abhaanta ॥92॥

सुंदर सरूप ॥ सोभंत भूप ॥ दस चार वंत ॥ सोभा अभंत ॥९२॥

The fourteen worlds had received brilliance from the glory of his charming elegance.92.

169218 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੮


ਗੁਨ ਗਨ ਅਪਾਰ ॥ ਸੁੰਦਰ ਉਦਾਰ ॥ ਦਸ ਚਾਰ ਵੰਤ ॥ ਸੋਭਾ ਸੁਭੰਤ ॥੯੩॥

Guna Gana Apaar ॥ Suandara Audaar ॥ Dasa Chaar Vaanta ॥ Sobhaa Subhaanta ॥93॥

गुन गन अपार ॥ सुंदर उदार ॥ दस चार वंत ॥ सोभा सुभंत ॥९३॥

That generous king had innumerable qualities and had skill in fourteen science.93.

169229 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੯


ਧਨ ਗੁਨ ਪ੍ਰਬੀਨ ॥ ਪ੍ਰਭ ਕੋ ਅਧੀਨ ॥ ਸੋਭਾ ਅਪਾਰ ॥ ਸੁੰਦਰ ਕੁਮਾਰ ॥੯੪॥

Dhana Guna Parabeena ॥ Parabha Ko Adheena ॥ Sobhaa Apaar ॥ Suandara Kumaar ॥94॥

धन गुन प्रबीन ॥ प्रभ को अधीन ॥ सोभा अपार ॥ सुंदर कुमार ॥९४॥

That beautiful king was most glorious, capable, expert in qualities and had faith in God.94.

1692310 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੧੦


ਸ਼ਾਸਤ੍ਰੱਗ ਸੁੱਧ ॥ ਕ੍ਰੋਧੀ ਸੁ ਜੁੱਧ ॥ ਨ੍ਰਿਪ ਭਯੋ ਬੇਨ ॥ ਜਨੁ ਕਾਮਧੇਨ ॥੯੫॥

Shaastragga Su`dha ॥ Karodhee Su Ju`dha ॥ Naripa Bhayo Bena ॥ Janu Kaamdhena ॥95॥

शासत्रग सुध ॥ क्रोधी सु जुध ॥ न्रिप भयो बेन ॥ जनु कामधेन ॥९५॥

The king had knowledge of Shastras; he was extremely furious in war; he was the fulfiller of all wishes like Kamadhenu, the wish-fulfilling cow.95.

1692411 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੧੧


ਖੂਨੀ ਸੁ ਖੱਗ ॥ ਜੋਧਾ ਅਭੱਗ ॥ ਖੱਤ੍ਰੀ ਅਖੰਡ ॥ ਕ੍ਰੋਧੀ ਪ੍ਰਚੰਡ ॥੯੬॥

Khoonee Su Khagga ॥ Jodhaa Abhagga ॥ Khattaree Akhaanda ॥ Karodhee Parachaanda ॥96॥

खूनी सु खग ॥ जोधा अभग ॥ खत्री अखंड ॥ क्रोधी प्रचंड ॥९६॥

The king with his bloody dagger was and invincible, complete, furious and powerful warrior.96.

1692512 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੧੨


ਸਤ੍ਰੂਣਿ ਕਾਲ ॥ ਕਾਢੀ ਕ੍ਰਵਾਲ ॥ ਸਮ ਤੇਜ ਭਾਨ ॥ ਜ੍ਵਾਲਾ ਸਮਾਨ ॥੯੭॥

Satrooni Kaal ॥ Kaadhee Karavaal ॥ Sama Teja Bhaana ॥ Javaala Samaana ॥97॥

सत्रूणि काल ॥ काढी क्रवाल ॥ सम तेज भान ॥ ज्वाला समान ॥९७॥

When he drew his sword, he was like KAL (death) for his enemies; and his magnificence was like the fires of the sun.97.

1692613 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੧੩


ਜਬ ਜੁਰਤ ਜੰਗ ॥ ਨਹਿ ਮੁਰਤ ਅੰਗ ॥ ਅਰਿ ਭਜਤ ਨੇਕ ॥ ਨਹਿ ਟਿਕਤ ਏਕ ॥੯੮॥

Jaba Jurata Jang ॥ Nahi Murata Ang ॥ Ari Bhajata Neka ॥ Nahi Ttikata Eeka ॥98॥

जब जुरत जंग ॥ नहि मुरत अंग ॥ अरि भजत नेक ॥ नहि टिकत एक ॥९८॥

When he fought, none of his limbs turned back; none of his enemies could stand before him and thus ran away.98.

1692714 ਦਸਮ ਗਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਪੰਨਾ ੧੨੦੯ ਪੰ. ੧੪


       


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