Sri Nanak Prakash

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५०. सतिगुर मंगल भरथरी कौडा॥

{भरथरि} ॥२॥
{भरथरि दा पूरब प्रसंग} ॥१२॥
{कौडा} ॥३३॥
{मरदाना राखश दे काबू} ॥४४॥
{गुरू जी दा बिरद} ॥५२॥
{अदभुत शीशा} ॥६९॥
{कौडे दा पूरब प्रसंग} ॥८४॥
{विचार रूप दरपन} ॥९८॥
दोहरा: मया सदन पंकज बदन मोह कदन गतिदैन
चरन शरन तिन परन मम दरशन परसन चैन ॥१॥
मया=क्रिपा, मेहर सदन=घर
बदन=मूंह, मुखड़ा पंकज=कमल
पंकज बदन=मुखारबिंद कदन=कज़टं वाला
परन=आसरा परसन=छुह
चैन=सुख, आराम
अरथ: मेहर दा घर (संसार दे) मोह ळकज़टके मुकती देणहारे (श्री सतिगुरू जी,
जिन्हां) दा मुखड़ा कमल (वरगा सुंदर) है, अुन्हां दे चरनां दी शरन दा मैळ
आसरा है, (जिन्हां चरनां दे) दरशन अर छुह प्रापती नाल सुख (प्रापत)
हुंदा है
श्री बाला संधुरु वाच ॥
चौपई: आगै गमने श्री गुरू पूरे
निज दासन जो देण गति रूरे
भरथरि१ आश्रम जहां सुहावन {भरथरि}
तहां जाइ पहुंचे जसुपावन२ ॥२॥
जिह मानहि सो सगरो देशा
त्रीय राज पुनि अपर३ नरेशा
पूजक हुते सरब नर नारी
महिमा योगन की तहिण भारी ॥३॥
तिह आश्रम के जाइ समीपा
बैसि गए बेदी कुलदीपा


१भरथरी दा
२पविज़त्र जस वाले
३होर

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