Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) १२५

दास लगे पग सेवन को,
अहंमेव१ बिना गुरदेव थिए ॥२३॥
जो सिख सेवक श्री गुर नानक
सो सुनि कै सभि आवति हैण।
-गादी लई गुरता२ गुर अंगद
सो बिदते३- सुनि पावति हैण।
देखति जोति महां मुख जागति४,
जोण नट सांग बनावति हैण।
एक ही बेख अनेक धरे
सभि लोकन को बिरमावति हैण५ ॥२४॥
गुरता रथ पै गुर सूरज दूसर
मास६ बिते तन राजति हैण७।
मोहि अंधेर को दूर करैण
अघ चोर८ शिताब ही भाजति हैण।
ब्रिंद खिरे अरबिंद महां सिख९,
पेचक निदक१० लाजति हैण।
होति प्रकाश चहूं दिश मैण
तिम गान रिदे अुपराजति हैण११ ॥२५॥
सारब भौम१२ महां महिपालकि१३
पोशिश१४ पूरब१५ की तजि कै।१हंकार।
२गुरिआई।
३ओह (गुरू अंगद जी) प्रगट होए हन।
४देखदे हन (कि ओहो) महान जोत (गुर नानक दी) मुखड़े ते जागदी है।
५मोणहदे हन।
६महीना।
७बिराज रहे हन।
८पाप रूपी चोर।
९समूह कवलां रूपी सिज़ख महां खिड़े।
१०अुज़लू रूपी निदक।
११अुतपत करदे हन।
१२सारी प्रिथवी दा चज़क्रवरती ।संस: सारव भौम॥।
१३वज़डा राजा।
१४पौशाक।
१५पहिली।

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