Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ४) १४५

१९. ।जंग-जारी॥
१८ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ४ अगला अंसू>>२०
दोहरा: स्री अजीत सिंघ जीत ले, घायल सकल संभालि।
पित समीप आवति भए, भनोण जंग अहिवाल ॥१॥
चौपई: अुदे सिंघ आलम सिंघ दोअू।
कुछक घाइ खै के तन सोअू१।
अपर सिंघ केतिक मरि गए।
सुरपरि बसेभोग सुख लए ॥२॥
पहुचे गुर सुत संग हग़ूर।
श्रौनत लिपत भये पट सूर२।
आलम सिंघ भनोण अहिवाला।
प्रभु जी! संघर भयो बिसाला ॥३॥
स्री अजीत सिंघ करो घमंड३।
बान प्रचंड सु तूरन छंडि४।
बिचरति शज़त्रनि महि धरि धीरज।
हते बहुत करि करि निज बीरज५ ॥४॥
लगी तुफंग तुरंगम गिरो।
अुतरो हुइ सुचेत तर खरो।
पहुचि दास ने दूसर दीन।
भए अरोहन जुज़ध प्रबीन ॥५॥
तुम प्रताप बल ते बहु सिंघ।
घने मारि म्रिग रिपु बन सिंघ।
घाइल आज भये बहुतेरे।
खड़ग प्रहार प्रहार६ घनेरे ॥६॥
ऐसी कटा भई अज हेरति।
जिम खाती बड बन को गेरति।
श्रमति सिंघ घाइल गन लखीअहि।


१तिन्हां दे सरीराण ळ कुझ ग़खम लगे।
२सूरमिआण दे।
३भाव घमसान वाला जंग।
४छेती छेती चलाके।
५आपणा बल ला ला के।
६तलवार दे वार मार मारके।

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