Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) २१५

श्री अंगद के दरशन कारन।
जाइ खडूर सु करहिण निहारन१।
पाछल पांइ चलहिण जबि आवैण।तीन कोस लग एव सिधावैण ॥३७॥
तहां खरे हुइ बंदन ठानहिण।
पुन घर दिश मुख करहिण पयानहिण।
केतिक सिज़खन ते सुनि और२।
जल गागर आनति इस ठौर ॥३८॥
नदी बिपासा ते भरि लावहिण।
श्री गुर को इशनान करावहिण।
लेनि जाहिण चलि पाछल ओर३।
आनन राखहिण तबि गुर ओर ॥३९॥
इस थल आवहिण सीस निवावहिण।
पुन सलिता दिश मुख करि जावहिण।
नित प्रति करहिण इसी बिधि कार।
इमि सेवहिण श्री गुर दरबार ॥४०॥
परसराम तप तपे बिसाला।
बरख हजारहण बन४ सभि काला।
प्रापति कला बिशनु की चारु।
भयो न तअू बडो अवतार ॥४१॥
इनहुण इकादश संमत मांही।
सेवा करी रिझाए तांही।
पूरन भए प्रभू अवतारे।
जग महिण दास अुधार हग़ारे ॥४२॥
यां ते सतिगुर अरु सतिसंग।
इन की सेवा अधिक अुतंग।
बरख हग़ारहण तप जे घाले।
तिन ते सेवा अहै बिसाले ॥४३॥


१दरशन।
२कई सिज़खां तोण (इक) होर गज़ल सुणी है कि।३पिछले पैरीण।
४जंगल विच।

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