Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १२) २२६

२८. ।कशमीरी पंडत॥
२७ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि १२ अगला अंसू>>२९
दोहरा: प्रान अंत लौ दिज भए, जाने रिदै त्रिनैन१।
क्रिपा धारि पज़त्री पज़त्री बिखे, लिखि अुपाइ के बैन ॥१॥
चौपई: -श्री नानक जग गुरू बिसाला।
अज़प्रमेय समरथ कलि काला।
तिन गादी पर बैठो जोइ।
काज तुमारे सारहि सोइ ॥२॥
इही पज़त्रिका ले तुम जावहु।
ब्रिथा आपनी सकल सुनावहु।
सो राखहिगे धरम तुहारा।
तिन बिन अन ते है न अुबारा ॥३॥
अुठहु अहार जाइकरि करो।
रिदै भरोसा गुर पर धरो-।
जहि दिज बैठे मंडल करि कै२।
त्रिखत छुधित संकट को धरि कै ॥४॥
अरध जाम जामनि जबि रही।
बिज़प्र ब्रिंद बिच अुतरी तहीण३।
भई प्रभाति सूर अुजिआरा।
परो सु कागद सभिनि निहारा ॥५॥
हाथ अुठाइ बिलोका खोला४।
अज़खर शुज़ध पाठ करि बोला५।
जानि अचंभै मिलि समुदाए।
पठति सुनति सभि है इक थाएण ॥६॥
भली भांति आशै को जानि।
कौन गुरू अबि करहु बखानि?
तिन महु इक दिज लखहि ब्रितंत।
तेग बहादर गुर भगवंत ॥७॥


१शिव जी ने।
२घेरा पा के।
३(चिज़ठी) अुज़तरी तिज़थे ही।
४देख के खोलिआ।
५शुज़ध अज़खराण दा पाठ बोलंा कीता।

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