Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति ४) २३८

३१. ।भाई आसा सिंघ॥
३०ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति ४ अगला अंसू>>३२
दोहरा: जहि कहि दिशि पसरो सुजसु,
सिंध मेखला भूम१।
भयो पंथ शुभ खालसा,
घाली सैलनिधूम ॥१॥
ललितपद छंद: मिलि करि राजे बाई धारन
प्रजा सहित सभि जोधा।
तीन लाख गिनती महि इक थल
सतिगुर पर करि क्रोधा ॥२॥
करी ढूक अरु करी ढोइ करि
हेला मिलि मिलि घाला२।
अलप खालसा आनदपुरि महि
झाल झाल दर* ठाला३ ॥३॥
मरद गरद महि मिले ग़रद मुख
हरद रंग है भागे४।
दुरद दरे तन५ घाव दरद भा
थिरे न सिंघन आगे ॥४॥
जित कित कहति मंद गिरपति अति
मत हति चित की होई।
सतिगुर संग जंग करि मूरख
कोण न बिसूरहि सोई ॥५॥
इक तौण श्री नानक की गादी
खंड दीप जिन जीते।
करामात साहिब जग बिदते
पीर मीर धरि भीते६ ॥६॥

१भाव सारी धरती अुज़ते।
२ढुज़कंा कीता ते हाथी ढोके ते मिल मिलके हज़ला कीता।
*पा:-दल।
३ठलिआ (हाथी ळ) दरवाग़े ते।
(अ) (पहाड़ीआण दी झाल) झज़लके दल ळ ठलिआ।
४पीले मुख हरदी वरगे रंग होके भज़ज गए।५हाथी ने दरड़ दिज़ते सरीर।
६डरदे हन।

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