Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १२) २४०

३०. ।अहिदीए वापस। गुरू जी सैफा बाद॥
२९ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि१२ अगला अंसू>>३१
दोहरा: अहिदी चढि करि खाट पर, सभि समाज धरि पास।
निकसे पुरि ते नरन सिर, अुरध अुठाइसि तास ॥१॥
चौपई: आगे ग्राम गमनते आवैण।
पाछलि नर तिन खाट टिकावैण।
तहि ते नए निकासि बिगारी१।
आइ अुठावहि लेण सिरधारी ॥२॥
बैठि मंच पर पंथ पयानहि।
सरब प्रजा पर हुकम बखानहि।
लेति सभिनि ते घ्रित मिशटान।
आमिख सोण अहार करि खान ॥३॥
सने सने मारग महि चालहि।
नित अनदपुरि नाम संभालहि२।
चलति चलति केतिक दिन मांही।
नरनि सीस पर अुठे सु जाहीण३ ॥४॥
सतुज़द्रव तीर पहूचे आइ।
करति हुकम को गमनति जाइ४।
आइ अनदपुरि कीनसि डेरा।
चढे मंच बैठे तिस बेरा ॥५॥
खान पान करि निसा बिताई।
जागे पुन प्रभाति हुइ आई।
बैठनि सभा समा सुनि करि के५।
गुर सोण मिलनि लालसा धरि के ॥६॥
भए ताग अहिदी तबि दौन।
थिरता सिंघ पौर गहि तौन६।
सुध सतिगुर के निकटि पठाइव।


१नवेणवगारी (फड़के)।
२याद करदे होए।
३जाणदे हन (अहिदीए)।
४चले जाणदे हन।
५सभा विच बैठं दा समां सुणके।
६दरशनी डिअुड़ी विच ओह जा ठहिरे।

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