Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि ६)३३४

४१. ।अबदुल खां वज़लोण हज़ला॥
४०ॴॴपिछला अंसू ततकरा रासि ६ अगला अंसू>>४२
दोहरा: बजे जुझाअू१ बहुत ही, जुटे सुभट सु कटज़क२।
कटि कटि झट पट बिकट जे, सटपट कै न अटज़क३ ॥१॥
रसावल छंद: चले तीर गोरी।
मनो खेलि होरी।
सटा सज़ट सेले४।
मनो मूठ मेले५ ॥२॥
समूहैण तुफंगा।
करे घाअु अंगा।
लगी पीचकारी६।
खिरो रंग भारी ॥३॥
पतंगी सु रंगा७।
चलो श्रों अंगा।
सु ढाले अुछाले।
तफैण जोण बिसाले ॥४॥
सु मारं अलावैण।
मनो गीत गावैण।
परैण धाइ धाई।
क्रिपानैण चलाई ॥५॥
कटैण अंग गेरैण।
सु लोथैण घनेरैण।
नबाबं दिखावैण।
बडे ओज लावैण॥६॥
नहीण पाइ पाछे।
भिरे सुर आछे।

१मारू (वाजे)।
२सैना दे।
३जेहड़े (बिकट =) बहादुर (सूरमे सन अुह बी सटपटा गए (जदोण) झज़ट पज़ट कटा वज़ढ (होण लग
पई ते) कोई बी ना अटकिआ।
४छेती (छेती) सुज़टदे (= चलाअुणदे हन) सेले।
५मानोण (गुलाल दीआण) मुज़ठां पांवदे हन।
६पिचकारी।
७वकम लकड़ी जो बड़ा सुहणां लाल रंग दिंदी है ।सं: पत्रग॥

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