Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (रुति १) ३७८

५१. ।शेर मारिआ, बुज़धू शाह विदा होया॥५०ॴॴपिछला अंसू ततकरा रुति १ अगला अंसू>>

दोहरा: श्री कलीधर देखि कै, अूचे कहो पुकारि।
छोरहु नहीण तुफंग को, टिके रहहु बन लारि१ ॥१॥
चौपई: दोनहु न्रिप जुति सैना सारी।
हेत बंगारनि गिरा अुचारी।
एक सुभट ले खड़ग सु ढाल।
ललकारहि२ सभि आगे चालि ॥२॥
छार सहार वार करवार३।
करहि जुज़ध ले केहरि मार।
मुख मांगे हम बखशहि तांही।
निकसहि धीर धारि अुर मांही ॥३॥
सुनि करि फतेशाह बच बोला।
प्रभु जी केहरि ओज अतोला।
को नर अस इस को बल झालै।
हुइ सवधान वार पुन घालै ॥४॥
चिरंकाल को इत अुत फिरै।
नहि को धिर* धरि४ आगे अरै।
सैलन देश बिखै बज़खात।
किसहूं नहि कीनो इह घाति ॥५॥
को है सम रावर के कहो।
तरुन बैस बल समरथ अहो।
नांहि त चलनै देहु तुफंग।
गुलकाण ब्रिंद लगहि इक संग ॥६॥
जे हति होइ परै तन भूपर।
नतु पहुचो जानहु किस अूपर।
मिलो बीच तबि मुशकल मारनि।१कतार बणा के।
२(शेर ळ) ललकारे।
३(शेर दी) छाल ळ सहारे ते वार (करे) तलवार दा (शेर अुते)।
*पा:-सिर।
४धीरज धरके।

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