Sri Gur Pratap Suraj Granth

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स्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ (राशि १) ४३१

यां ते सभि सरीर के मांही।
बिना भसम श्रोंत कित नांही।
तअू न मुझ अस आनणद आवा।
जस तूं देखि रिदे गरबावा- ॥४३॥
सुने बाक अरु नैन निहारो।
मुनि+ मंकं चित चाअु निवारो।
हटो नाचिबे ते, जग शांती।
इस प्रकार मुनि भए संगाती ॥४४॥
तिन के तप करिबे++ इसथान।
भए अधिक पावन मन जानि।
करहि शनान सु होइ पुनीत**।
इमि प्रसंग सुनि कै शुभ रीति ॥४५॥
संगत भई हरख, करि नमो।
सारसुती मज़जे तिह समो।
श्री गुर अमर कीन इशनान।
मिले ब्रिज़प तिनि दीनसि दान* ॥४६॥

+पा:-सुनि।
++तप दी महिमा जो इथे दज़सी है, श्री गुरू जी दे मत विच निरे तप दी कोई थां नहीण। हां
गुरमुख सेवा, बाणी दा अभिआस, नाम सिमरण, कीरतन श्रवं, कीरतन करना एह तप सारे
दज़से हन। फोके तपां दी गुरबाणी विच निेधी है। इस प्रसंग विच भी तप दे अखीर तेहंकार ही
पले पिआ दज़सिआ है। गुरू वाक-
गुर सेवा तपां सिरि तपु सारु'॥
तथा- जाप ताप नेम सुचि संजम नाही इन बिधे छुटकार'॥
जो इशनान दा महातम दिज़ता है: अुस पर इस यातरा संबंधी गुरू रामदास जी ने आप दज़सिआ
है कि प्रयोजन तीरथां दे शनान तोण मुकती प्रापती दा नहीण सी सगोण तीरथां दी अरदास सी कि
साडे विच मैल पई है सो दूर करो। यथा:-तीरथ कहिणदे हन:
किल विख मैलु भरे परे हमरै विचि हमरी मैलु साधू की धूरि गुआई'॥
**गुरू साहिब जी दा सिधांत इह है:-
मलु हअुमै धोती किवै न अुतरै जे सअु तीरथ नाइ॥
।सिरी राग म३॥
*बिना जाति पात दे खिआल दे दीन, दुखी ते अनाथां ळ दान देणा गुरमत अनकूल है, जिहाकि
इसे अंसू दे अंक ३५ विच दज़सिआ है।
जथा शकति सभिहिनि दे दान।
जे इस दान तोण मुकित प्रापती भाव लिआ जावे तां अुस दी निखेधी विच तीसरी पातशाही
जी आप फुरमाअुणदे हन
इसनानु दानु जेता करहि दूजै भाइ खुआरु'॥
।सिरी राग म१॥

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